मामूली चीज़ का देवता / अरुंधति रॉय
Language: hin- Publication details: नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन, 2005.Description: 358pISBN:- 9788126708406
- भारतीय अंग्रेज़ी उपन्यास -- अनूदित हिंदी साहित्य -- आधुनिक कथा साहित्य
- सामाजिक भेदभाव -- साहित्य में चित्रण -- जाति और वर्ग संघर्ष
- परिवार और समाज -- कथा साहित्य -- पारिवारिक संबंध
- नारीवाद और लैंगिक भेदभाव -- साहित्यिक दृष्टिकोण -- महिला पात्रों का चित्रण
- केरल (भारत) -- साहित्य में चित्रण -- सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश
- 823.92 ROY-M
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मामूली चीज़ों का देवता एक विशुद्ध व्यावहारिक अर्थ में तो शायद यह कहना सही होगा कि यह सब उस समय शुरू हुआ, जब सोफ़ी मोल आयमनम आई। शायद यह सच है कि एक ही दिन में चीज़ें बदल सकती हैं। कि चंद घंटे समूची ज़िन्दगियों के नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। और यह कि जब वे ऐसा करते हैं, उन चंद घंटों को किसी जले हुए घर से बचाए गए अवशेषों की तरह - करियाई हुई घड़ी, आँच लगी तस्वीर, झुलसा हुआ फ़र्नीचर - खंडहरों से समेट कर उनकी जाँच-परख करनी पड़ती है। सँजोना पड़ता है। उनका लेखा-जोखा करना पड़ता है। छोटी-छोटी घटनाएँ, मामूली चीज़ें, टूटी-फूटी और फिर से जोड़ी गईं। नए अर्थों से भरी। अचानक वे किसी कहानी की निर्वर्ण हड्डियाँ बन जाती हैं। फिर भी, यह कहना कि वह सब कुछ तब शुरू हुआ जब सोफ़ी मोल आयमनम आई, उसे देखने का महज़ एक पहलू है। साथ ही यह दावा भी किया जा सकता था कि वह प्रकरण सचमुच हज़ारों साल पहले शुरू हुआ था। मार्क्सवादियों के आने से बहुत पहले। अंग्रेज़ों के मलाबार पर कब्ज़ा करने से पहले, डच उत्थान से पहले, वास्को डि गामा के आगमन से पहले, ज़मोरिन की कालिकट विजय से पहले। किश्ती में सवार ईसाइयत के आगमन और चाय की थैली से चाय की तरह रिसकर केरल में उसके फैल जाने से भी बहुत पहले हुई थी। कि वह सब कुछ दरअसल उन दिनों शुरू हुआ जब प्रेम के क़ानून बने। वे क़ानून जो यह निर्धारित करते थे कि किस से प्रेम किया जाना चाहिए, और कैसे। और कितना। बहरहाल, व्यावहारिक रूप से एक नितान्त व्यावहारिक दुनिया में...वह दिसम्बर उनहत्तर का (उन्नीस सौ अनुच्चरित था) एक आसमानी नीला दिन था। एक आसमानी रंग की प्लिमथ, अपने टेलफ़िनों में सूरज को लिये, धान के युवा खेतों और रबर के बूढ़े पेड़ों को तेज़ी से पीछे छोड़ती कोचीन की तरफ़ भागी जा रही थी...
Hindi.
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