स्त्री-मुक्ति की सामाजिक : (Record no. 39427)
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| 000 -LEADER | |
|---|---|
| fixed length control field | 05187nam a22001697a 4500 |
| 020 ## - INTERNATIONAL STANDARD BOOK NUMBER | |
| ISBN | 9789395737388 |
| 082 ## - DEWEY DECIMAL CLASSIFICATION NUMBER | |
| Classification number | 305.42 |
| Item number | ANA-S |
| 100 ## - MAIN ENTRY--AUTHOR NAME | |
| Personal name | अनामिका |
| 245 ## - TITLE STATEMENT | |
| Title | स्त्री-मुक्ति की सामाजिक : |
| Sub Title | मध्यकाल और नवजागरण / |
| Statement of responsibility, etc | अनामिका |
| 260 ## - PUBLICATION, DISTRIBUTION, ETC. (IMPRINT) | |
| Place of publication | नई दिल्ली: |
| Name of publisher | राजकमल प्रकाशन, |
| Year of publication | 2023. |
| 300 ## - PHYSICAL DESCRIPTION | |
| Number of Pages | 168p. |
| 520 ## - SUMMARY, ETC. | |
| Summary, etc | आज भी स्त्रीवाद के सामने सबसे बड़ा लक्ष्य यही है कि वह मनुष्य मात्र में स्त्री-दृष्टि का विकास करे। यह सिर्फ़ स्त्रियों की अपनी मुक्ति का मसला नहीं है, पुरुष को भी उन जकड़बदियों से मुक्त होने की ज़रूरत है जो एक तरफ़ उसे शक्ति देती हैं कि वह किसी को बाँध सके तो दूसरी तरफ़, ख़ुद उसे भी एक चौखटे में जड़ देती हैं। बहुत कुछ बदला है, बहुत कुछ बदलने-बदलने को है। संस्थाओं-प्रतिष्ठानों का पौरुष ढीला पड़ा है और स्त्री-तत्व के प्रवाह के लिए परिवार से लेकर राष्ट्र तक, सभी जगह नए झरोखों-रास्तों ने जन्म लिया है। ख़ासतौर से लेखन में स्त्री का स्वर निर्णायक भंगिमा और अपनी विशिष्ट पहचान के साथ उभरकर आया है। स्त्री ने निसंकोच भाव से अपनी एक भाषा गढ़ी है, आलोचना की अपनी प्रविधियाँ विकसित की हैं, उन विशेषताओं को जाना है जो उसे एक बेहतर मनुष्य बनाती हैं और यह भी समझा है कि उसका होना संसार के लिए कितना ज़रूरी है। लेकिन उसका सहगामी और अब तक वर्चस्व का केन्द्र रहा पुरुष भी क्या उतना ही बदला है? और क्या स्त्री का यह आत्मविश्वास अचानक हुई कोई घटना है या पीछे इतिहास में शुरू हुई किसी लम्बी प्रक्रिया का प्रतिफल? ‘स्त्री-मुक्ति की सामाजिकी : मध्यकाल और नवजागरण’ हिन्दी के मध्यकालीन काव्य तथा सामाजिक सौन्दर्यबोध के पुनर्पाठ के माध्यम से इसी प्रक्रिया का लेखा-जोखा करने की कोशिश करती है। मध्यकाल और पुनर्जागरण के दौर की रचनाओं, रचनाकारों और दूर भविष्य तक को प्रभावित करने वाली प्रवृत्तियों को रेखांकित करते हुए यह किताब स्त्री-विमर्श के उदात्त पक्षों का अन्वेषण और समय तथा समाज की सीमाओं का आकलन दोनों करती है। मध्यकालीन नायिकाओं और स्त्री-रचनाकारों की विनोद-वृत्ति जो उनकी आन्तरिक मुक्ति की ही एक भंगिमा थी; रहीम की ‘नगर शोभा’ में स्त्रियों का चित्रण और उसकी सामाजिकी; स्त्री भक्त-कवियों का अस्मिताबोध और आधुनिक स्त्री-दृष्टि से रीतिकाल के पुनर्पाठ से लेकर मैथिलीशरण गुप्त के काव्य में आई स्त्री तक, अनामिका ने इस पुस्तक में अपनी रस-सिद्ध आलोचना-शैली में एक पूरे युग का जायज़ा लिया है। |
| 546 ## - LANGUAGE NOTE | |
| Language note | Hindi |
| 650 ## - SUBJECT ADDED ENTRY--TOPICAL TERM | |
| Topical Term | नारीवाद |
| 650 ## - SUBJECT ADDED ENTRY--TOPICAL TERM | |
| Topical Term | महिला-भेदभाव |
| 942 ## - ADDED ENTRY ELEMENTS (KOHA) | |
| Source of classification or shelving scheme | Dewey Decimal Classification |
| Koha item type | Books |
| Withdrawn status | Lost status | Damaged status | Not for loan | Home library | Current library | Date acquired | Source of acquisition | Cost, normal purchase price | Bill Date | Full call number | Accession Number | Cost, replacement price | Price effective from | Koha item type |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| NASSDOC Library | NASSDOC Library | 22/03/2024 | Overseas press | 429.59 | 2024-03-21 | 305.42 ANA-S | 54636 | 595.00 | 21/05/2024 | Books |
