कार्योजित महिलाएं एवं सामाजिक रूपांतरण (कामकाजी महिलाओ के समायोजन एवं परिवर्तन का समाजशास्त्रीय अध्ययन) / भरत सिंह
Language: Hindi Publication details: New Delhi : ICSSR, 2015Description: 192pSubject(s): DDC classification:- RS.0947
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Research Reports
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NASSDOC Library | Post Doctoral Research Fellowship Reports | RS.0947 (Browse shelf(Opens below)) | Not For Loan | 52499 |
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प्रस्तुत अध्ययन वाराणसी एवं चन्दौली के संदर्भ पर केन्द्रित है। अध्ययन के निदर्शन हेतु प्रशासन, शिक्षा, विधि, चिकित्सा, उद्योग, प्रबन्ध व्यवसाय एवं समाज सेवा सम्बन्धी विभागों / संस्थाओं / इकाईयों से सम्बद्ध 600 कार्यशील महिलाओं का चयन किया जायेगा व्यापक एवं स्वस्पष्ट अनुसूची के प्रश्नों के आधारपर उत्तरदात्रियों की प्रतिक्रियाओं का संकलन एवं मूल्यांकन किया गया। साथ ही औपचारिक स्तर पर साक्षात्कार एवं अनौपचारिक वार्ता द्वारा उत्तदात्रियों के विचारों, प्रतिक्रियाओं एवं विकल्पों का संकलन किया गया। उत्तरदात्रियों के चयन के आयु सामाजिक-आर्थिक स्थिति, व्यवसाय, जाति एवं धर्म तथा शिक्षा से सम्बन्धित बिन्दुओं को भी ध्यान में रखा गया। महिलाओं से जुड़े विविध प्रयोजनों के अध्ययनों से सार्दभिक अनुभव एवं ज्ञान का संकलन किया गया। फलतः अध्ययन का स्वरूपण करना सम्भव हुआ । तृतीय विश्व के समाजों के सम्मुख सामाजिक परिवर्तन से सम्बद्ध अनेक समस्याएं एवं चुनौतियां है। किन्तु जिस प्रकार क्रमशः लोकतांत्रिक संरचनाएं सशक्त बनेगी उसी अनुपात में लोकतांत्रिक मूल्यों एवं प्रक्रियाओं को सम्बल प्राप्त होगा. सामाजिक परिवर्तन की गति एवं दिशा का भी विश्वसनीय होना स्वाभाविक है। राजस्थान के सन्दर्भ में सामन्तवादी एवं शोषणपरक ऐतिहासिक अनुभवों को अनदेखा नहीं किया जा सकता महिला के स्तर भूमिका एवं आकांक्षाओं का मूल्यांकन सामाजिक विरोधाभासों से मुक्त स्थिति में करना सम्भव नहीं है। महिला को यत्र-तत्र सम्मान एवं गरिमा का स्तर चाहे प्रदान किया गया हो, किन्तु सामान्य महिला के प्रति सामाजिक दृष्टि एवं महिला समाज के रूपान्तरण के विषय में ऐतिहासिक एवं समसामयिक प्रश्नचिन्ह प्रस्तुत है। राष्ट्रीय स्तर पर भी इस स्थिति में किसी मौलिक परिवर्तन को नहीं देखा गया। यत्र-तत्र महिला समाज के विकास को अपवाद ही मानना होगा क्योंकि बहुसंख्यक महिला समाज मूक एवं विकास से परे हैं। ग्रामीण एवं कस्बों अथवा शहरी क्षेत्रों में महिला विकास के विषय में किसी महत्वपूर्ण अन्तर हो वहीं देखा गया।
शिक्षित एवं कार्यशील महिलाओं की बढ़त संख्या के बावजूद वस्तु स्थिति में विशेष अन्तर देखे जा सकते। भारत में स्वतन्त्रता के पश्चात भी अवश्य ही शिक्षित एवं अशिक्षित कार्यशील महिला की मात्रात्मक वृद्धि को नकारा नहीं जा सकता। अवश्य ही राष्ट्रीय सार्वजनिक जीवन में एवं अनेक कार्यक्षेत्रों में महिलाओं की भूमिका एवं योगदान में वृद्धि हुई है किन्तु इस स्थिति में बावजूद व्यापक राष्ट्रीय स्तर पर कोई प्रभावी परिवर्तन नहीं हो पाया है। दूसरी ओर विकासशील समाजों में इस कतिपय परिवर्तनका सर्वव्यापी होना आवश्यक है। महिला किसी भी क्षेत्र में एवं किसी भी स्तर पर कार्यशील हो, व्यक्तिगत क्षमता एवं कौशल की भूमिका निर्णायक रही है। इस वास्तविकता को महिला एवं पुरुष के विरोभासों से मुक्त कर, सामाजिक समन्वय एवं न्याय के आयामों को सशक्त बनाना आवश्यक है। कार्यशील महिला का इंगितीकरण केवल परिवार से बाहर कार्यरत होना माना जाए तो वर्तमान पहलू में निहित अस्पष्टता बनी रहेगी क्योंकि परिवार के दायित्वों की पूर्ति हेतु प्रतिबद्ध एवं व्यस्त गृहिणी भी कार्यरत ही हैं साथ ही परिवार से बाहर कार्यशील महिला न केवल पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति करती है वरन् कार्यस्थल के अतिरिक्त दायित्वों का निर्वाह करना भी महिला के लिए अनिवार्य हो जाता है। व्यक्तित्व विकास हेतु अन्य विकल्प सम्भव भी नहीं है। इस प्रकरण में पुरुष बनाम महिला की दृष्टि विसंगतियों की जन्मदाता है। महिला एवं पुरुष के मध्य न्याय समानता एवं परिपुरकता के आधार पर सामाजिक संरचना को परिपक्व बनाना अपेक्षित है। लिंग न्याय किसी अवास्तविक समता का प्रतिक नहीं है। सामाजिक वास्तविकताओं के परिप्रेक्ष्य में वैयक्तिक तथा सामाजिक दायित्वों का निर्धारण आवश्यक है। जैसे पुरुष समाज वैसे ही महिला समाज भी नागरिकता के वृहत वृत में भागीदार है। नागरिकता के सशक्त दायित्वों के अनुरूप राजनीतिक दृष्टिकोण की स्थिति एवं दिशा अनिवार्य है। सामाजिक परिवर्तन को इस प्राथमिकता से विलग्न नहीं देखा जा सकता।
Indian Council of Social Science Research.
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