माटी एवं संस्कृति के प्रहरी : भगवान बिरसा / युगलेश्वर
Language: Hindi Publication details: नई दिल्ली : भारतीय ज्ञानपीठ, 2020.Description: 175pISBN:- 9789387919969
- Maati evam Sanskriti ke prahari: Bhagwan Birsa
- 954.035092 YUG-M
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NASSDOC Library | 954.035092 YUG-M (Browse shelf(Opens below)) | Available | 53463 |
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| 954.035092 THA-G Gandhi in Bombay | 954.035092 WEB-G Gandhi as Disciple and Mentor | 954.035092 WEB-G Gandhi as disciple and mentor / | 954.035092 YUG-M माटी एवं संस्कृति के प्रहरी : | 954.0356 GON-C स्वतंत्रता के लिए परिधान | 954.0357 CHO-F The First World War, anticolonialism and imperial authority in British India, 1914-1924/ | 954.0358 SIN-S Specters of Mother India: the global restructuring of an empire |
Includes bibliographical references and index.
पुस्तक 'माटी एवं संस्कृति के प्रहरी : भगवान बिरसा' झारखंडी जनजातीय जीवन के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक संघयों का उद्घोष है। यह स्मारिका है धरती आवा 'बिरसा' के उन महान संघर्षो का जिसमें उन्होंने तत्कालीन जनजातीय जीवन एवं संस्कृति पर होने वाले खतरे की ओर संकेत किया था। आज भी ऐसा ही प्रश्न झारखंड एवं देश की जीवन संस्कृति पर खड़ा है और खतरे की घंटी बनकर प्राकृतिक जैव विविधता को नष्ट कर देने की साजिश में आमदा है। डॉ. युगल झा ने झारखंडी जीवन मूल्यों, जिनके कारण धरती के पुरोधाओं ने अपनी शहादत दी है जिसमें भगवान बिरसा का योगदान अप्रतिम है, बहुआयामी प्रभाव वाले उत्प्रेरक तत्त्वों को इस पुस्तक में रेखांकित करने की उत्कृष्ट कोशिश की है। बिरसा मुंडा के जीवन और कर्म चिन्तन की पूरी पूरी व्याख्या है, यह इनकी अनुपम रचना -'माटी एवं संस्कृति के प्रहरी भगवान बिरसा' । विभिन्न अध्यायों में लिखी यह पुस्तक स्वतन्त्रता- संग्राम के पूर्व जनजातियों ने अपने स्वशासन एवं देशज सांस्कृतिक चेतना की सुरक्षा में जितने भी आन्दोलन किए हैं, जिनकी अगुवाई इन आदिवासी क्रान्ति पुत्रों ने की है की चर्चा है। साथ ही अपने सम्पूर्ण राजनीतिक संघर्ष में क्रान्तिकारी विरसा युग पुरुष की तरह जिन प्रश्नों को उठाया गया है वह आज भी विकराल मुँह बाए खड़ा है। आज भी सत्ता और कॉरपोरेट घरानों की मिलीभगत ने झारखंड के पर्यावरण, जल-जंगल-जमीन व प्राकृतिक संसाधनों पर लूट-पाट की पूरी संस्कृति से कोहराम मचाए हुए है। ऐसे ही ज्वलन्त प्रश्नों को डॉ. युगल झा ने अपनी इस पुस्तक में शोधपूर्ण व्याख्या के रूप में प्रस्तुत किया है।
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