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प्रागैतिहास / इरफान हबीब

By: Language: hin- Series: भारत का लोक इतिहास -1Publication details: दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, 2022.Description: 94pISBN:
  • 9788126725182
Other title:
  • Pragaitihas
Subject(s): DDC classification:
  • 934 HAB-P
Summary: 'प्रागैतिहास' पुस्तक में उस युग की कहानी है जिस पर लिखित दस्तावेजों से कोई रोशनी नहीं पड़ती। यह पुस्तक 'भारत का लोक इतिहास' (पीपुल्स हिस्ट्री ऑफ इंडिया) नामक एक बड़ी परियोजना का हिस्सा है, लेकिन इसे एक स्वतन्त्र पुस्तक के रूप में भी देखा जा सकता है। तीन अध्यायों की इस पुस्तक के पहले अध्याय में भारत की भूगर्भीय संरचनाओं, मौसम में परिवर्तन तथा प्राकृतिक पर्यावरण (वनस्पति और प्राणी जगत) की उस हद तक चर्चा की गई हैं, जहाँ तक हमारे प्रागैतिहास और इतिहास को समझने के लिए प्रासंगिक है। दूसरे अध्याय में मानव जाति की कहानी को पूरी दुनिया के सन्दर्भ में और फिर उसके अन्दर भारत के सन्दर्भ में पेश किया गया है। उसके औजार समूहों में परिवर्तन को औजार निर्माता लोगों के प्रकार के साथ जोड़कर देखा गया है। तीसरा अध्याय मूल रूप से खेती के विकास और उसके साथ-साथ शोषणकारी सम्बन्धों की शुरुआत का वर्णन करता है। पुस्तक में इस बात की कोशिश की गई है कि ताजातरीन सूचनाएँ, उपलब्ध प्रामाणिक ग्रन्थों और पत्रिकाओं से ही उद्धृत की जाएँ। यह भी कोशिश की गई है कि चीजों को 'लोक लुभावन' तथा आडम्बरपूर्ण बनाए बगैर शैली को सरलतम रखा जाए। तकनीकी शब्दों के प्रयोग को न्यूनतम रखा गया है और यह भी प्रयास किया गया है कि प्रत्येक तकनीकी शब्द का प्रयोग करते समय वहीं पर उसकी एक परिभाषा प्रस्तुत कर दी जाए। प्रत्येक अध्याय के अन्त में एक पुस्तक सूची टिप्पणी भी दी गई है जहाँ उस विषय पर और अधिक सूचना देनेवाली महत्त्वपूर्ण पुस्तकों और लेखों को संक्षिप्त टिप्पणियों के साथ दर्ज किया गया है।
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Books NASSDOC Library 934 HAB-P (Browse shelf(Opens below)) Available 53442

Includes bibliographical references and index.

'प्रागैतिहास' पुस्तक में उस युग की कहानी है जिस पर लिखित दस्तावेजों से कोई रोशनी नहीं पड़ती। यह पुस्तक 'भारत का लोक इतिहास' (पीपुल्स हिस्ट्री ऑफ इंडिया) नामक एक बड़ी परियोजना का हिस्सा है, लेकिन इसे एक स्वतन्त्र पुस्तक के रूप में भी देखा जा सकता है। तीन अध्यायों की इस पुस्तक के पहले अध्याय में भारत की भूगर्भीय संरचनाओं, मौसम में परिवर्तन तथा प्राकृतिक पर्यावरण (वनस्पति और प्राणी जगत) की उस हद तक चर्चा की गई हैं, जहाँ तक हमारे प्रागैतिहास और इतिहास को समझने के लिए प्रासंगिक है। दूसरे अध्याय में मानव जाति की कहानी को पूरी दुनिया के सन्दर्भ में और फिर उसके अन्दर भारत के सन्दर्भ में पेश किया गया है। उसके औजार समूहों में परिवर्तन को औजार निर्माता लोगों के प्रकार के साथ जोड़कर देखा गया है। तीसरा अध्याय मूल रूप से खेती के विकास और उसके साथ-साथ शोषणकारी सम्बन्धों की शुरुआत का वर्णन करता है। पुस्तक में इस बात की कोशिश की गई है कि ताजातरीन सूचनाएँ, उपलब्ध प्रामाणिक ग्रन्थों और पत्रिकाओं से ही उद्धृत की जाएँ। यह भी कोशिश की गई है कि चीजों को 'लोक लुभावन' तथा आडम्बरपूर्ण बनाए बगैर शैली को सरलतम रखा जाए। तकनीकी शब्दों के प्रयोग को न्यूनतम रखा गया है और यह भी प्रयास किया गया है कि प्रत्येक तकनीकी शब्द का प्रयोग करते समय वहीं पर उसकी एक परिभाषा प्रस्तुत कर दी जाए। प्रत्येक अध्याय के अन्त में एक पुस्तक सूची टिप्पणी भी दी गई है जहाँ उस विषय पर और अधिक सूचना देनेवाली महत्त्वपूर्ण पुस्तकों और लेखों को संक्षिप्त टिप्पणियों के साथ दर्ज किया गया है।

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