ग्राम सवराजय
Publication details: प्रभात प्रकाशन 2023Description: 224pISBN:- 9789350480212
- Gram Swarajya
- 307.72 GAN-G
| Cover image | Item type | Current library | Home library | Collection | Shelving location | Call number | Materials specified | Vol info | URL | Copy number | Status | Notes | Date due | Barcode | Item holds | Item hold queue priority | Course reserves | |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
Books
|
NASSDOC Library | हिंदी पुस्तकों पर विशेष संग्रह | 307.72 GAN-G (Browse shelf(Opens below)) | Available | 54014 |
Browsing NASSDOC Library shelves,Collection: हिंदी पुस्तकों पर विशेष संग्रह Close shelf browser (Hides shelf browser)
|
|
|
|
|
|
No cover image available | ||
| 307.141720954 ARU-; Janjatiya vikas evam panchayati raj: Madhya Pradesh mein Katni zile ka adhyayan | 307.3364082 SAX-M Malin basti ki mahilayein: apradh aur pulice | 307.3364082 SAX-M Malin basti ki mahilayein: apradh aur pulice | 307.72 GAN-G ग्राम सवराजय | 307.772 DEE-J Janjatiya bhugol | 307.772 DES-B Baiga janjati ka samajshastriya adhyayan: Balghat jile ke sandharb mein | 307.772 DUB-J Janjatiya samaj ka samajshastra |
ग्राम स्वराज्य—महात्मा गांधी यह सोचना गलत है कि गांधीजी आज के उद्योगीकरण के बारे में बहुत पुराने विचार रखते थे। सच पूछा जाए तो वे उद्योगों के यंत्रीकरण के विरुद्ध नहीं थे। गाँवों के लाखों कारीगरों को काम दे सकनेवाले छोटे यंत्रों में जो भी सुधार किया जाए, उसका वे स्वागत करते थे। गांधीजी बड़े-बड़े कारखानों में विपुल मात्रा में माल पैदा करने के बजाय देश के विशाल जन-समुदायों द्वारा अपने घरों और झोंपड़ों में माल का उत्पादन करने की हिमायत करते थे। वे भारत के प्रत्येक सबल व्यक्ति को पूरा काम देने के बारे में बहुत अधिक चिंतित रहते थे और मानते थे कि यह ध्येय तभी सिद्ध होगा जब गाँवों में सुचारु रूप से ग्रामोद्योगों तथा कुटीर उद्योगों का संगठन और संचालन किया जाएगा। महात्मा गांधी ग्राम-पंचायतों के संगठन द्वारा आर्थिक और राजनीतिक सत्ता के विकेंद्रीकरण का जोरदार समर्थन करते थे। दुर्भाग्य से आर्थिक जीवन के नैतिक और आध्यात्मिक पहलू की हमेशा उपेक्षा की गई है, जिसके फलस्वरूप सच्चे मानव-कल्याण को बड़ी हानि पहुँची है। आधुनिक अर्थशास्त्री अब इस महत्त्वपूर्ण आवश्यकता पर जोर देने लगे हैं कि यदि हमें विशाल पैमाने पर तीव्र गति से आर्थिक विकास साधना है तो ‘वस्तुओं की गुणवत्ता’ बढ़ाने के साथ ‘मनुष्यता की गुणवत्ता’ भी बढ़ानी चाहिए। अतः वर्तमान परिस्थिति में गांधीजी के ‘ग्राम स्वराज्य’ की अवधारणा के पठन-पाठन की महती आवश्यकता है।
There are no comments on this title.
