आधुनिकता के आईने में दलित / संपा. अभय कुमार दुबे, श्रृंखला संपादक विजय बहादुर सिंह, योगेंद्र यादव

Contributor(s): Language: Hindi Publication details: नयी दिल्ली : वाणी प्रकाशन, 2005.Description: 422pISBN:
  • 8107551331
Other title:
  • Adhunikta ke aayine mei dalit
Subject(s): DDC classification:
  • 305.5688 ADH-
Summary: आधुनिकता के आईने में दलित की बुनियादी मान्यता यह है कि धर्म और परंपरा के ही नहीं, आधुनिकता के दायरे में भी दलित समस्या का पूरा समाधान संभव नहीं हो पाया है। यह संकलन आधुनिकता के सापेक्ष इस समस्या के हल की दिक्कतों और संभावनाओं का संधान करता है। विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सी.एस.डी.एस.) द्वारा प्रायोजित लोक-चिंतन ग्रंथमाला की इस पहली कड़ी में समझने की कोशिश की गयी है कि साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष से ले कर एक आधुनिक राष्ट्र-निर्माण की विराट परियोजना चलाने के दौरान दलित समस्या पूरी तरह क्यों नहीं दूर हुई। दलित आंदोलन के स्रोतों की खोज से शुरू हुई यह बौद्धिक यात्रा इतिहास, संस्कृति, अस्मिता, चेतना, साहित्य, अवमानना के राजनीतिक सिद्धांत और ज्ञान-मीमांसा के क्षेत्रों से गुजरने के बाद व्यावहारिक राजनीति में होने वाली दलीय होड़ की जाँच-पड़ताल करती है ताकि भारतीय गणतंत्र के संविधान प्रदत्त सार्विक मताधिकार की समाज परिवर्तनकारी क्षमताओं की असली थाह ली जा सके। यह दलित-मीमांसा उन ताजा बहसों पर गहरी नजर डालती है जो अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुँची हैं लेकिन जिनकी परिणतियों में दलित प्रश्न को आमूल-चूल बदल डालने की क्षमता है। ये बहसें दलित प्रश्न के भूमंडलीकरण से तो जुड़ी हुई हैं ही, साथ ही भूमंडलीकरण के साथ दलितों के संबंध की प्रकृति को खोजने की कोशिश भी करती हैं।
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आधुनिकता के आईने में दलित की बुनियादी मान्यता यह है कि धर्म और परंपरा के ही नहीं, आधुनिकता के दायरे में भी दलित समस्या का पूरा समाधान संभव नहीं हो पाया है। यह संकलन आधुनिकता के सापेक्ष इस समस्या के हल की दिक्कतों और संभावनाओं का संधान करता है।
विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सी.एस.डी.एस.) द्वारा प्रायोजित लोक-चिंतन ग्रंथमाला की इस पहली कड़ी में समझने की कोशिश की गयी है कि साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष से ले कर एक आधुनिक राष्ट्र-निर्माण की विराट परियोजना चलाने के दौरान दलित समस्या पूरी तरह क्यों नहीं दूर हुई। दलित आंदोलन के स्रोतों की खोज से शुरू हुई यह बौद्धिक यात्रा इतिहास, संस्कृति, अस्मिता, चेतना, साहित्य, अवमानना के राजनीतिक सिद्धांत और ज्ञान-मीमांसा के क्षेत्रों से गुजरने के बाद व्यावहारिक राजनीति में होने वाली दलीय होड़ की जाँच-पड़ताल करती है ताकि भारतीय गणतंत्र के संविधान प्रदत्त सार्विक मताधिकार की समाज परिवर्तनकारी क्षमताओं की असली थाह ली जा सके। यह दलित-मीमांसा उन ताजा बहसों पर गहरी नजर डालती है जो अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुँची हैं लेकिन जिनकी परिणतियों में दलित प्रश्न को आमूल-चूल बदल डालने की क्षमता है। ये बहसें दलित प्रश्न के भूमंडलीकरण से तो जुड़ी हुई हैं ही, साथ ही भूमंडलीकरण के साथ दलितों के संबंध की प्रकृति को खोजने की कोशिश भी करती हैं।

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