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राजभाषा हिंदी की दशा और दिशा /वेद प्रकाश गौड़

By: Language: HIN Publication details: दिल्ली : संस्कृति, शिक्षा और राजभाषा संस्थान, 2023.Description: viii, 200pISBN:
  • 9788195574810
Other title:
  • Rajbhasha hindi ki dasha aur disha
Subject(s): DDC classification:
  • 491.43854 GAU-R
Summary: यह लेख भारत में हिंदी की बहुआयामी भूमिका को रेखांकित करता है। हिंदी न केवल संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त राजभाषा है, बल्कि देश की सबसे व्यापक जनभाषा, संपर्क भाषा और तेजी से उभरती विश्वभाषा भी है। नई शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं और हिंदी को दिए गए महत्त्व से इसके भविष्य को और मजबूती मिलने की आशा व्यक्त की गई है। लेख में हिंदी की ग्रहणशीलता, अनुवाद परंपरा और भारतीय संस्कृति की एकता-अखंडता में उसकी भूमिका पर बल दिया गया है। साथ ही यह विचार प्रस्तुत किया गया है कि शिक्षा, व्यापार, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, कूटनीति और रोजगार जैसे क्षेत्रों में हिंदी और भारतीय भाषाओं को माध्यम बनाना देश के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक है। अंग्रेजी को ही प्रगति का एकमात्र साधन मानने की भ्रांति को गलत ठहराते हुए, अपनी भाषा और संस्कृति के माध्यम से आत्मसम्मान, राष्ट्रीय चेतना और वैश्विक नेतृत्व की संभावना पर जोर दिया गया है। अंततः हिंदी को भारतीय अस्मिता, सांस्कृतिक शक्ति और भारत के उभरते वैश्विक स्वरूप की आधारशिला बताया गया है।
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Books NASSDOC Library 491.43854 GAU-R (Browse shelf(Opens below)) Available 54861

यह लेख भारत में हिंदी की बहुआयामी भूमिका को रेखांकित करता है। हिंदी न केवल संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त राजभाषा है, बल्कि देश की सबसे व्यापक जनभाषा, संपर्क भाषा और तेजी से उभरती विश्वभाषा भी है। नई शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं और हिंदी को दिए गए महत्त्व से इसके भविष्य को और मजबूती मिलने की आशा व्यक्त की गई है। लेख में हिंदी की ग्रहणशीलता, अनुवाद परंपरा और भारतीय संस्कृति की एकता-अखंडता में उसकी भूमिका पर बल दिया गया है।

साथ ही यह विचार प्रस्तुत किया गया है कि शिक्षा, व्यापार, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, कूटनीति और रोजगार जैसे क्षेत्रों में हिंदी और भारतीय भाषाओं को माध्यम बनाना देश के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक है। अंग्रेजी को ही प्रगति का एकमात्र साधन मानने की भ्रांति को गलत ठहराते हुए, अपनी भाषा और संस्कृति के माध्यम से आत्मसम्मान, राष्ट्रीय चेतना और वैश्विक नेतृत्व की संभावना पर जोर दिया गया है। अंततः हिंदी को भारतीय अस्मिता, सांस्कृतिक शक्ति और भारत के उभरते वैश्विक स्वरूप की आधारशिला बताया गया है।

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