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माँ की पुकार Bhartendu Prakash Sinhal

By: Language: HIN Publication details: नई दिल्ली किताब घर 2011Edition: प्रथम संस्करणDescription: 656pISBN:
  • 9788170169024
Other title:
  • Maa ki Pukar
Subject(s): DDC classification:
  • 891.4 SIH-M
Summary: समीक्षाएँ वह ग्रंथ भारत का कष्ट ग्रंथ रचना की प्रेरणा, राष्ट्रवाद और मानवता के ध्रुवों को सफलतापूर्वक छूने, समझने तथा उसकी उपयोगिता के तत्त्वों से समाज की लाभान्वित करने के कल्याणकारी चिंतन से प्रसूत है। विवेकानंद का राष्ट्रीयता के धरातल पर टिका हुआ अध्यात्म इस ग्रंथ में सारपूर्ति एवं तर्कपूर्ण रूप में विविध संदभों में विश्लेषित होकर अपनी मौलिकता एवं कवीक्ता के साथ पल्लवित एवं जीवंत हुआ है। इसमें चित्रित युगबोध अप्रतिम है। श्री चंदपाल शर्मा शीलेश राजभाषा विभाग, ग्रह मंत्रालय पूरी पुस्तक के प्रतुल पृष्ठों पर धीर-गंभीर चिंतन, अध्यात्म दर्शन की मीमांसाएँ और मानवीय कर्म के मापदंडों की विस्मयकारी परिभाषाएँ परिलक्षित होती हैं। पुस्तक की संपूर्ण सामग्री बहुत ही सारगर्भित, अमूल्य और अद्वितीय है। इतने क्लिष्ट और गंभीर बोधगम्य विषयों को लेखक ने जिस सहज, सरल, तर्कपूर्ण और स्पष्ट व्याख्याओं के साथ विश्लेषित किया है वह बहुत प्रशंसनीय है। आज के युग में इस पुस्तक की बहुत बड़ी भूमिका होगी यह पुस्तक उच्च कोटि के विचारों को बड़ी सुलभता से व्यक्त करके उसे 'पूर्ण मानव' बनने की प्रेरणा देती है। राजस्थान पत्रिका मुझे पुस्तकों का थोड़ा व्यसन रहा है, पर मुझे याद नहीं आता कि मैंने कभी ऐसी सुबोध, रुचिकर, संपूर्ण यथार्थ जीवन-दर्शन प्रदायनी, मंगलकारी कोई रचना हिंदी में तो क्या अंग्रेजी में भी देखी हो। यह कृति तो युवक को सच्ची भारतीयता और मानव को दिव्य मानवीयता प्रदायिनी है। बुझे हुए दीपक को भी पुनः प्रन्ञ्चलित करने की शक्ति इसमें है। कन्हैया लाल गुप्त (अ०ग्रा०) प्राचार्य एवं पूर्व सदस्य विधान परिषद् विधानसभा, वृंदावन
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Books NASSDOC Library हिंदी पुस्तकों पर विशेष संग्रह 891.4 SIH-M (Browse shelf(Opens below)) Available 54892

समीक्षाएँ
वह ग्रंथ भारत का कष्ट ग्रंथ रचना की प्रेरणा,
राष्ट्रवाद और मानवता के ध्रुवों को सफलतापूर्वक
छूने, समझने तथा उसकी उपयोगिता के तत्त्वों से
समाज की लाभान्वित करने के कल्याणकारी चिंतन
से प्रसूत है। विवेकानंद का राष्ट्रीयता के धरातल पर
टिका हुआ अध्यात्म इस ग्रंथ में सारपूर्ति एवं तर्कपूर्ण
रूप में विविध संदभों में विश्लेषित होकर अपनी
मौलिकता एवं कवीक्ता के साथ पल्लवित एवं जीवंत
हुआ है। इसमें चित्रित युगबोध अप्रतिम है।
श्री चंदपाल शर्मा शीलेश
राजभाषा विभाग, ग्रह मंत्रालय
पूरी पुस्तक के प्रतुल पृष्ठों पर धीर-गंभीर चिंतन,
अध्यात्म दर्शन की मीमांसाएँ और मानवीय कर्म के
मापदंडों की विस्मयकारी परिभाषाएँ परिलक्षित होती
हैं। पुस्तक की संपूर्ण सामग्री बहुत ही सारगर्भित,
अमूल्य और अद्वितीय है। इतने क्लिष्ट और गंभीर
बोधगम्य विषयों को लेखक ने जिस सहज, सरल,
तर्कपूर्ण और स्पष्ट व्याख्याओं के साथ विश्लेषित
किया है वह बहुत प्रशंसनीय है। आज के युग में इस
पुस्तक की बहुत बड़ी भूमिका होगी यह पुस्तक
उच्च कोटि के विचारों को बड़ी सुलभता से व्यक्त
करके उसे 'पूर्ण मानव' बनने की प्रेरणा देती है।
राजस्थान पत्रिका
मुझे पुस्तकों का थोड़ा व्यसन रहा है, पर मुझे याद
नहीं आता कि मैंने कभी ऐसी सुबोध, रुचिकर, संपूर्ण
यथार्थ जीवन-दर्शन प्रदायनी, मंगलकारी कोई रचना
हिंदी में तो क्या अंग्रेजी में भी देखी हो। यह कृति तो
युवक को सच्ची भारतीयता और मानव को दिव्य
मानवीयता प्रदायिनी है। बुझे हुए दीपक को भी पुनः
प्रन्ञ्चलित करने की शक्ति इसमें है।
कन्हैया लाल गुप्त
(अ०ग्रा०) प्राचार्य एवं पूर्व सदस्य विधान परिषद्
विधानसभा, वृंदावन

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