| 000 | 03899nam a2200217 4500 | ||
|---|---|---|---|
| 999 |
_c38378 _d38378 |
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| 020 | _a9788126701254 | ||
| 041 | _ahin- | ||
| 082 |
_a305.8954 _bSRI-A |
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| 100 |
_aश्रीनिवास, एम. एन. _eलेखक. _eauthor . |
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| 245 |
_aआधुनिक भारत में जाति / _cएम. एन. श्रीनिवास |
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| 260 |
_aदिल्ली : _bराजकमल प्रकाशन, _c2020. |
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| 300 | _a180p. | ||
| 500 | _ainclude index. | ||
| 504 | _aIncludes bibliographical references and index. | ||
| 520 | _aअथक अध्ययन और शोध के परिणामस्वरूप एम. एन. श्रीनिवास के निबन्ध आकार ग्रहण करते हैं। भारतीय समाज की नब्ज पर उनकी पकड़ गहरी और मजबूत है। उनके लेखन में इतिहास और बुद्धि का बोझिलपन नहीं है। प्रस्तुत पुस्तक में संगृहीत निबन्धों में समाजशास्त्र व नृतत्त्वशास्त्र विषयक समस्याओं के व्यावहारिक पक्षों पर रोशनी डाली गई है। लेखक समस्याओं की तह में जाना पसन्द करता है और उसके विश्लेषण का आधार भी यही है। हर समाज की अपनी मौलिक संरचना होती है। जिस संरचना को उस समाज के लोग देखते हैं, वह वैसी नहीं होती जैसी समाजशास्त्री शोध और अनुमानों के आधार पर प्रस्तुत करते हैं। भारतीय समाजशास्त्रियों ने जाति-व्यवस्था के जटिल तथ्यों को 'वर्ग' की मर्यादाओं में समझने की भूल की और जिसके चलते सामाजिक संरचना का अध्ययन सतही हो गया। गत सौ-डेढ़ सौ वर्षों के दौरान जाति-व्यवस्था का असर कई नए-नए कार्यक्षेत्रों में विस्तृत हुआ है और उसकी ऐतिहासिक व मौजूदा तंत्र की नितान्त नए दृष्टिकोण से विश्लेषण करने की माँग एम. एन. श्रीनिवास करते हैं। हमारे यहाँ जाति-व्यवस्था की जड़ें इतनी गहरी हैं कि बिना इसके सापेक्ष परिकलन किए मूल समस्याओं की बात करना बेमानी है। एम.एन. श्रीनिवास का मानना है कि समाज- वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए राजनीतिक स्तर के जातिवाद तथा सामाजिक एवं कर्मकांडी स्तर के जातिवाद में फर्क करना जरूरी है। | ||
| 546 | _aHindi. | ||
| 650 |
_aजाति व्यवस्था _zभारत. |
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| 650 |
_aसामाजिक वर्ग _zभारत. |
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| 650 |
_aसामाजिक असमानता _zभारत. |
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| 942 |
_2ddc _cBK |
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