| 000 | 03139 a2200181 4500 | ||
|---|---|---|---|
| 999 |
_c38887 _d38887 |
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| 020 | _a9789390372713 | ||
| 041 | _aHindi | ||
| 082 |
_a954 _bMUR-J |
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| 100 |
_aमुरारी,मयंक _qMayank Murari |
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| 245 |
_aजंबूद्वीपे भरतखंडे: _cमयंक, मुरारी |
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| 246 | _aJambudweepe Bharatkhande: Sanatan Pravah Ka Mul Sthan | ||
| 260 |
_bप्रभात प्रकाशन _c2023 _a दिल्ली |
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| 300 | _a224p. | ||
| 520 | _aभारतीय चिंतन में कल्प की अवधारणा का समय के साथ-साथ व्योम; यानी देश के हिसाब से भी विचार किया गया है। पृथ्वी के द्वारा सूर्य का परिभ्रमण करने से संवत्सर काल बनता है। इसी प्रकार जब सूर्य अपनी आकाशगंगा का चक्कर लगाता है तो उसका एक चक्र पूरा होने के समयखंड को मन्वंतर कहा जाता है। इस प्रकार आकाशगंगा भी इस ब्रह्मांड में किसी ध्रुवतारे या सप्तर्षि या अन्य तारे का चक्कर लगाती है; उसके एक चक्कर की गणना को ही कल्प कहा गया। हमारा सौरमंडल आकाशगंगा के बाहरी इलाके में स्थित है और उसके केंद्र की परिक्रमा कर रहा है। इसे एक परिक्रमा पूरी करने में लगभग 22.5 से 25 करोड़ वर्ष लग जाते हैं। —इसी पुस्तक से भारतीय जीवन में देश और काल है। काल के साथ गति है और गति के संग जीवनदर्शन जुड़ा है। यह बात ही भारत को विशिष्ट बनाती है। कालचक्र; युगचक्र; ऋतुचक्र; धर्मचक्र; भाग्यचक्र और कर्मचक्र के विधान भारतीय सांस्कृतिक चेतना में समाए हुए हैं। सनातन के माहात्म्य; भारतीय चिंतन की वैज्ञानिकता और भारतीय जीवन-मूल्यों की पुनर्स्थापना करती विचारोत्तेजक पठनीय कृति। | ||
| 650 |
_a सनातन प्रवाह _vTranslation to heaven _xhuman _zIndia |
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| 650 |
_aस्वर्ग में अनुवाद _vमनुष्य _zभारत |
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| 942 |
_2ddc _cBK |
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