000 04312 a2200217 4500
999 _c38891
_d38891
020 _a9789352664610
082 _a954.0536
_bKAS-
100 _aचंद्र, त्रिखा
_eलेखक
_qChandra Trikha
100 _aगर्ग, अशोक
_eलेखक
_qAshok Garg
100 _aआहूजा, सुभाष
_eलेखक
_qSubhash Ahuja
245 _aकैसे भूले आपातकाल का दंश :
_cChandra Trikha, Ashok Garg, Subhash Ahuja
246 _aKaise Bhoolen Aapatkal Ka Dansh
260 _bप्रभात प्रकाशन,
_c2023.
300 _a326P.
_bसंदर्भ, चित्रण, ग्राफिक
520 _a1971 के भारत-पाक युद्ध एवं बांग्लादेश के नाम से नए राष्ट्र के निर्माण ने तत्कालीन प्रधानमंत्री 'श्रीमती इंदिरा गांधी की छवि को एक नया शिखर प्रदान किया था। एक ऐसा शिखर, जहाँ पहुँचकर, संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होता। ये वे दिन थे, जब सरकारी तंत्र एवं सत्ता तंत्र भ्रष्टाचार के मामले में निरंकुश हो चुका था। सामान्य जनों का धैर्य जवाब देने लगा था। तत्कालीन प्रधानमंत्री उन दिनों भ्रष्टाचार की संरक्षक समझी जा रही थीं। वह अपने संगठन में फैले भीतरी असंतोष को भी कुचल रही थीं और प्रतिपक्षी आवाजों की भी घोर उपेक्षा कर रही थीं। इसके विरुद्ध संघर्ष में सर्वोदय समाज व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, कुछ पुराने निष्ठावान एवं गांधीवादी कांग्रेसियों और समाजवादियों की भूमिका विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण रही। अपने समर्पित नेताओं व कार्यकर्ताओं के बल पर संघ ने देश भर में भूमिगत आंदोलन, जन-जागरण एवं अहिंसक सत्याग्रह की जो इबारत दर्ज की, वह ऐतिहासिक थी। उस समय की सरकार के खिलाफ समाज में गंभीर वैचारिक आक्रोश जाग्रत् करने और बाद में चुनाव की सारी व्यवस्था सँभालने में भी संघ के स्वयंसेवकों ने प्रमुख भूमिका निभाई। इस सारे घटनाक्रम में कई ऐसे गुमनाम कार्यकर्ताओं को अपने जीवन तक गँवाने पड़े। उनके अमूल्य बलिदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। यह शुभ्र ज्योत्स्ना उन सब हुतात्माओं को विनम्र श्रद्धासुमन अर्पित करती है। आपातकाल के काले दिनों का सिलसिलेवार देखा-भोगा जीवंत सच है यह पुस्तक|
546 _aHindi
650 _aEmergency management
_vHistory
_xCivil rights
_zIndia
650 _aआपातकालीन प्रबंधन
_vइतिहास
_xनागरिक आधिकार
_z भारत
700 _e Trikha, Chandra,Ashok Garg, Shubhash Auja
942 _2ddc
_cBK