000 05301nam a2200241 4500
999 _c39409
_d39409
020 _a9788126708406
041 _ahin-
082 _a823.92
_bROY-M
100 _aरॉय,अरुंधति
_eलेखक
245 _aमामूली चीज़ का देवता /
_cअरुंधति रॉय
260 _aनई दिल्ली:
_bराजकमल प्रकाशन,
_c2005.
300 _a358p.
504 _aIncludes Bibliography and Index.
520 _aमामूली चीज़ों का देवता एक विशुद्ध व्यावहारिक अर्थ में तो शायद यह कहना सही होगा कि यह सब उस समय शुरू हुआ, जब सोफ़ी मोल आयमनम आई। शायद यह सच है कि एक ही दिन में चीज़ें बदल सकती हैं। कि चंद घंटे समूची ज़िन्दगियों के नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। और यह कि जब वे ऐसा करते हैं, उन चंद घंटों को किसी जले हुए घर से बचाए गए अवशेषों की तरह - करियाई हुई घड़ी, आँच लगी तस्वीर, झुलसा हुआ फ़र्नीचर - खंडहरों से समेट कर उनकी जाँच-परख करनी पड़ती है। सँजोना पड़ता है। उनका लेखा-जोखा करना पड़ता है। छोटी-छोटी घटनाएँ, मामूली चीज़ें, टूटी-फूटी और फिर से जोड़ी गईं। नए अर्थों से भरी। अचानक वे किसी कहानी की निर्वर्ण हड्डियाँ बन जाती हैं। फिर भी, यह कहना कि वह सब कुछ तब शुरू हुआ जब सोफ़ी मोल आयमनम आई, उसे देखने का महज़ एक पहलू है। साथ ही यह दावा भी किया जा सकता था कि वह प्रकरण सचमुच हज़ारों साल पहले शुरू हुआ था। मार्क्सवादियों के आने से बहुत पहले। अंग्रेज़ों के मलाबार पर कब्ज़ा करने से पहले, डच उत्थान से पहले, वास्को डि गामा के आगमन से पहले, ज़मोरिन की कालिकट विजय से पहले। किश्ती में सवार ईसाइयत के आगमन और चाय की थैली से चाय की तरह रिसकर केरल में उसके फैल जाने से भी बहुत पहले हुई थी। कि वह सब कुछ दरअसल उन दिनों शुरू हुआ जब प्रेम के क़ानून बने। वे क़ानून जो यह निर्धारित करते थे कि किस से प्रेम किया जाना चाहिए, और कैसे। और कितना। बहरहाल, व्यावहारिक रूप से एक नितान्त व्यावहारिक दुनिया में...वह दिसम्बर उनहत्तर का (उन्नीस सौ अनुच्चरित था) एक आसमानी नीला दिन था। एक आसमानी रंग की प्लिमथ, अपने टेलफ़िनों में सूरज को लिये, धान के युवा खेतों और रबर के बूढ़े पेड़ों को तेज़ी से पीछे छोड़ती कोचीन की तरफ़ भागी जा रही थी...
546 _aHindi.
650 _aभारतीय अंग्रेज़ी उपन्यास
_vअनूदित हिंदी साहित्य
_xआधुनिक कथा साहित्य
650 _aसामाजिक भेदभाव
_vसाहित्य में चित्रण
_xजाति और वर्ग संघर्ष
650 _aपरिवार और समाज
_vकथा साहित्य
_xपारिवारिक संबंध
650 _aनारीवाद और लैंगिक भेदभाव
_vसाहित्यिक दृष्टिकोण
_xमहिला पात्रों का चित्रण
650 _aकेरल (भारत)
_vसाहित्य में चित्रण
_xसामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश
700 _aनीलाभ,
_eअनुवादक
942 _2ddc
_cBK