| 000 | 04590nam a22001937a 4500 | ||
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| 999 |
_c39832 _d39832 |
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| 041 | _ahin | ||
| 082 |
_a821 _bVIJ-M |
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| 100 |
_aविजयवर्गीय, डॉ दयाकृष्ण _eलेखक _qडॉ दयाकृष्ण विजयवर्गीय 'विजय' |
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| 245 |
_aमुक्तक आ खड़ा सड़क पर / _cडॉ दयाकृष्ण विजयवर्गीय 'विजय' |
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| 246 | _aMuktak aa khada sadak par... by Dr. Dayakrishn Vijayvargiya 'Vijay' | ||
| 260 |
_aकोटा, राजस्थान : _bविजय प्रकाशन, _c2013. |
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| 300 | _a94p. | ||
| 520 | _aमुक्तक (चतुष्पदी) हिन्दी साहित्य में काव्य की एक विशिष्ट विधा मानी गई है। इसकी विशिष्टता इसकी पूर्णता में है। चारों पंक्तियों को पढ़े जाने के पश्चात्, इसे किसी पूर्वापर प्रसंग की अपेक्षा नहीं रहती । विद्वानों ने वेद ऋचाओं से ही मुक्तक साहित्य का प्रारम्भ माना है। अनेक संस्कृत ग्रंथों ने मुक्तक को परिभाषित भी किया है। अग्निपुराणकार से लेकर आचार्य अभिनव गुप्त तक ने मुक्तक को अपने ग्रंथों में परिभाषित किया है। हिन्दी में आचार्य रामचन्द शुक्ल ने भी अपने हिन्दी साहित्य के इतिहास में मुक्तक की, महाकाव्यों की रसात्मकता से तुलना करते हुए, इसकी पूर्णता प्रतिपादित कर, किसी पूर्वापर प्रसंग की आवश्यकता अनुभव नहीं की है। यह यही है कि सभी विद्वानों ने दोहों को दृष्टि में रखकर ही मुक्तको पर विचार किया है। दोहे अपने छोटे से कलेवर में भी कथ्य की पूर्णता सहेजे होते हैं। उनके लिए कहा भी गया है" देखन में छोटे लगे, घाव करें गम्भीर "। गजल के हर शेर (बंध) के संबंध में ही यही कहा जाता है कि उसका हर शेर अपने में स्वतंत्र तथा पूर्ण होता है। वैसे मैं यह मानता हूँ, वह पूरी गजल की प्रासंगिकता के प्रतिकूल कभी नहीं होता। मुक्तक दोहों से आकार में दुगने से भी अधिक बड़ा होता है, लेकिन दोनों में एक बात समान है, वह है विषय गत। जैसे दोहों का विषय गत विस्तार अनन्त है, वैसे ही मुक्तक भी विषयगत अनन्तता सहेजे होता है। हों एक मिन्नता भी दोनों में विल्कुल स्पष्ट है। दोहा स्वयं एक छन्द है। मुक्तक स्वयं छन्द नहीं है। दोहे को उसके निर्धारित प्रारूप में ही लिखा जा सकता है, जबकि मुक्तक किसी भी छन्द में, यहाँ तक की दोहे में भी लिखा जा सकता है। | ||
| 546 | _aहिंदी | ||
| 650 | _aहिंदी काव्य | ||
| 650 | _aमुक्तक (कविता). | ||
| 650 |
_aहिन्दी साहित्य _xआलोचना एवं व्याख्या. |
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| 942 |
_2ddc _cBK |
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