| 000 | 02304nam a22002177a 4500 | ||
|---|---|---|---|
| 005 | 20260123155253.0 | ||
| 020 | _a9789393647504 | ||
| 041 | _aHIN | ||
| 082 |
_a294.592046 _bAGR-P |
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| 100 | _aअग्रवाल, मीनू | ||
| 245 |
_aपुराणों में निर्वचन _c/मीनू अग्रवाल |
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| 246 | _aPurano mein nirvachan | ||
| 260 |
_aप्रयागराज : _bफर्स्ट प्रिन्ट पब्लिकेशन, _c2024. |
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| 300 | _axviii, 203p. | ||
| 520 | _aयह पुस्तक पौराणिक साहित्य में उपलब्ध निर्वचन परंपरा का एक सुव्यवस्थित और मौलिक अध्ययन प्रस्तुत करती है। इसमें अष्टादश पुराणों में बिखरे हुए निर्वचनों को पहली बार हिंदी भाषा में अक्षरानुक्रम से संकलित किया गया है तथा उन्हें प्राचीन ग्रंथीय संदर्भों और मूर्तिशिल्प चित्रों से पुष्ट किया गया है। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के अनुदान से सम्पन्न यह शोधग्रंथ पौराणिक शब्दों की व्युत्पत्ति और अर्थ-विवेचना को स्पष्ट करता है। यह पुस्तक न केवल शोधार्थियों के लिए, बल्कि भारतीय संस्कृति और पुराणों में रुचि रखने वाले सामान्य पाठकों के लिए भी अत्यंत उपयोगी संदर्भ ग्रंथ है। | ||
| 650 |
_aPhilology _xIndic literature |
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| 650 | _aSanskrit language | ||
| 650 | _aसंस्कृत भाषा | ||
| 650 |
_aभाषाशास्त्र _xइंडिक साहित्य |
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| 942 |
_2ddc _cBK |
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| 999 |
_c39851 _d39851 |
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